आयुर्वेद शब्द दो शब्दों से बना है — आयुः (जीवन) एवं वेद (ज्ञान), अर्थात् “जीवन का विज्ञान”। यह विश्व की सबसे प्राचीन चिकित्सा एवं जीवन-पद्धतियों में से एक है, जिसका मूल अथर्ववेद में मिलता है। महर्षि चरक (चरक संहिता) एवं महर्षि सुश्रुत (सुश्रुत संहिता — शल्य चिकित्सा के जनक) आयुर्वेद के महान आचार्य माने जाते हैं। आयुर्वेद केवल रोग का उपचार नहीं करता, अपितु रोग को होने से पहले रोकने पर बल देता है।
स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनम्।
अर्थात् — आयुर्वेद का उद्देश्य है स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगी के रोग को शांत करना। यही इसका मूल सिद्धांत है।
आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन दोषों से संचालित होता है, और इन्हीं के संतुलन में स्वास्थ्य निहित है:
जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है; असंतुलन होने पर रोग उत्पन्न होते हैं।
आयुर्वेद प्रकृति के अनुसार जीवन जीने पर बल देता है। दिनचर्या (दैनिक नियम) में प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागना, जीभ साफ करना, तेल मालिश, व्यायाम एवं संतुलित भोजन सम्मिलित हैं। ऋतुचर्या के अंतर्गत प्रत्येक ऋतु के अनुसार आहार-विहार में परिवर्तन का विधान है, जिससे शरीर मौसमी रोगों से बचा रहता है।
हमारी रसोई ही एक छोटा आयुर्वेदिक भंडार है:
आज की तनावपूर्ण एवं अनियमित जीवनशैली में आयुर्वेद पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। संतुलित आहार, योग, प्राणायाम एवं प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर हम अनेक जीवनशैली-जनित रोगों से बच सकते हैं। ध्यान रहे — किसी भी गंभीर रोग में योग्य वैद्य अथवा चिकित्सक की सलाह अवश्य लें; यह लेख केवल जागरूकता हेतु है।