सृष्टि के आरम्भ में केवल एक ही “मनुष्य जाति” थी। कालान्तर में महर्षियों ने मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव एवं आचरण को दृष्टिगत रखकर समाज को चार वर्णों में व्यवस्थित किया। इसी आधार पर बुद्धि एवं ज्ञान-प्रधान कर्म करने वाले ब्राह्मण वर्ण कहलाये। शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण एक “वर्ण” है, “जाति” नहीं।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
— (श्रीमद्भगवद्गीता ४/१३)
विन्ध्य पर्वत के उत्तर में निवास करने वाले पाँच ब्राह्मण-समूह “पंच गौड़” कहलाते हैं — सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड़, उत्कल एवं मैथिल। तथा विन्ध्य के दक्षिण के पाँच समूह “पंच द्रविड़” — कर्णाटक, तैलंग, द्राविड़, महाराष्ट्र एवं गुर्जर कहलाते हैं।
सारस्वताः कान्यकुब्जाः, गौडाः उत्कल मैथिलाः।
पञ्च गौडा इति ख्याताः, विन्ध्यस्योत्तरवासिनः॥
सारस्वती नदी के प्रान्त के निवासी सारस्वत, कश्मीर के आस-पास के कान्यकुब्ज, मिथिला क्षेत्र के मैथिल तथा उत्कल (उड़ीसा) के उत्कल ब्राह्मण कहलाये। जिन गौड़ ब्राह्मणों पर कोई विशेष नाम नहीं जुड़ा और जिन पर केवल “गौड़” नाम ही लागू रहा, वे “आदि गौड़ ब्राह्मण” कहलाये। इसीलिए शास्त्र-सम्मत रूप से “गौड़” एवं “आदि गौड़” में कोई भेद नहीं है — उत्तर भारत के सभी गौड़ ब्राह्मण मूलतः एक ही हैं।
स्कन्द पुराण, गौड़ स्मृति, ब्राह्मोत्पत्ति निबन्ध, ब्रह्मपुराण एवं महाभारत आदि के प्रमाणों के अनुसार आदि गौड़ ब्राह्मणों की उत्पत्ति कुरुक्षेत्र (ब्रह्मक्षेत्र) में हुई। ये वेद-शास्त्र-पुराणज्ञ, श्रौत-स्मार्त-परायण एवं सर्वदेश में पूज्य रहे।
आदौ जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः।
“गौड़” नाम का अर्थ — गंगा एवं गण्डकी के संगम से लेकर उत्तर में हिमालय तक फैली भूमि, अर्थात् ब्रह्मावर्त प्रदेश का नाम “गौड़ देश” रहा; इसी से गौड़ ब्राह्मणों की पहचान बनी। ग्रन्थों के अनुसार गौड़ ब्राह्मण बंगाल से नहीं आये — यदि ऐसा होता तो उनके खान-पान, रीति-रिवाज एवं बोली में बंगाल का प्रभाव अवश्य दिखता।
महाराज जनमेजय द्वारा आयोजित यज्ञ में महर्षि वकदेव मुनि ने अपने १४४४ शिष्य ब्राह्मणों को ग्राम दान किये। जो ब्राह्मण जिस ग्राम में बसा (शासन किया), उसी ग्राम के नाम से उसका “शासन (अल्प/अवटंक)” कहलाया। श्री आदि गौड़ प्रदीपिका के अनुसार इन्हीं १४४४ शासनों में से लगभग ७०३ शासन सनाढ्य में गिने जाते हैं। अतः गौड़, आदि गौड़ एवं सनाढ्य ब्राह्मण मूलतः एक ही हैं तथा इनमें परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध होता रहा है।
इसी गौरवशाली वैदिक विरासत को संजोने एवं बिखरे हुए समाजबंधुओं को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से सन् 1966 में दूरदर्शी बंधुओं ने आदि गौड़ ब्राह्मण समाज की स्थापना की। उद्देश्य स्पष्ट था — शिक्षा एवं संस्कारों को प्रोत्साहित करना, वैदिक परंपराओं का संरक्षण करना तथा जरूरतमंद परिवारों की निःस्वार्थ सहायता करना।
प्रारंभ में कुछ ही परिवारों से शुरू हुआ यह संगठन आज सैकड़ों शहरों एवं गाँवों में फैले हजारों परिवारों का विशाल परिवार बन चुका है। वार्षिक सम्मेलन, प्रतिभा सम्मान, सामूहिक विवाह, स्वास्थ्य शिविर एवं शैक्षणिक सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से समाज निरंतर सेवारत है।
कुरुक्षेत्र (ब्रह्मावर्त) में आदि गौड़ ब्राह्मणों की उत्पत्ति — पंच गौड़ परंपरा।
महाराज जनमेजय के यज्ञ में १४४४ शिष्य ब्राह्मणों को ग्राम दान — “शासन” परंपरा का आरम्भ।
दूरदर्शी बंधुओं द्वारा समाज संगठन की नींव रखी गई।
निःशुल्क वैवाहिक मंच एवं छात्रवृत्ति योजनाओं का शुभारंभ।
आधिकारिक वेबसाइट, ऑनलाइन सदस्य निर्देशिका एवं पञ्चाङ्ग गोत्रावली के साथ नए युग में प्रवेश।
स्रोत सन्दर्भ: गौड़ विप्र पञ्चाङ्ग गोत्रावली (संकलनकर्ता: गोविन्दलाल गौड़, जयपुर; वि.सं. २०६१) एवं ब्राह्मोत्पत्ति मार्तण्ड (बृहत् ज्योतिषार्णव, स्कन्ध ६ — हरिकृष्ण शास्त्री)।