हमारी संस्कृति में दान को धर्म का सर्वोच्च रूप माना गया है। जिस प्रकार नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, उसी प्रकार सज्जनों का जीवन एवं संपत्ति परोपकार के लिए ही होती है। दान देने से धन घटता नहीं, बल्कि उसका सदुपयोग होता है और समाज में समरसता बढ़ती है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अर्थात् — धन की तीन ही गतियाँ हैं: दान, भोग अथवा नाश। जो न दान करता है और न भोग, उसके धन की तीसरी गति (नाश) निश्चित है। अतः धन का श्रेष्ठतम उपयोग दान ही है।
शास्त्रों में सुपात्र को दिए गए दान को श्रेष्ठ बताया गया है। जरूरतमंद विद्यार्थी को शिक्षा हेतु सहायता, निर्धन कन्या के विवाह में सहयोग, रोगी की चिकित्सा में मदद — ये दान के सर्वोत्तम रूप हैं। दान सदैव बिना अहंकार एवं बिना प्रचार के, विनम्रता के साथ किया जाना चाहिए।
आज सेवा के अनेक संगठित रूप हैं — रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जाँच शिविर, छात्रवृत्ति योजनाएँ, आपदा राहत एवं वृद्धजन सहायता। हमारा समाज इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय है और प्रत्येक समाजबंधु से सहयोग की अपेक्षा रखता है।
सेवा के लिए धनवान होना आवश्यक नहीं — आवश्यक है सेवा-भाव। कोई धन से, कोई समय से, कोई ज्ञान से समाज की सेवा कर सकता है। जब समाज का प्रत्येक सदस्य अपने सामर्थ्य अनुसार योगदान देता है, तभी एक सशक्त, स्वावलंबी एवं संवेदनशील समाज का निर्माण होता है।