गायत्री मंत्र — महामंत्र का अर्थ एवं महत्व

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वेदमाता गायत्री

गायत्री मंत्र को समस्त वेदों का सार एवं “वेदमाता” कहा जाता है। यह ऋग्वेद में वर्णित है और इसके ऋषि विश्वामित्र तथा देवता सविता (सूर्य) माने जाते हैं। उपनयन संस्कार के समय प्रत्येक द्विज को सर्वप्रथम इसी मंत्र की दीक्षा दी जाती है। यह मंत्र बुद्धि, ज्ञान एवं सद्प्रेरणा का स्रोत माना गया है।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

मंत्र का सरल अर्थ

“उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।” — इस प्रकार यह मंत्र किसी भौतिक वस्तु की नहीं, अपितु सद्बुद्धि एवं विवेक की प्रार्थना है।

शब्दार्थ

  • ॐ — परब्रह्म का प्रतीक
  • भूर्भुवः स्वः — तीनों लोक (भौतिक, प्राण एवं आनंद)
  • तत् सवितुः वरेण्यं — उस श्रेष्ठ सविता (सृष्टिकर्ता) का
  • भर्गो देवस्य धीमहि — तेजस्वी दिव्य स्वरूप का हम ध्यान करें
  • धियो यो नः प्रचोदयात् — जो हमारी बुद्धि को सत्प्रेरणा दे

जप विधि

गायत्री मंत्र के जप का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) एवं सायंकाल संध्या का समय माना गया है। स्वच्छ होकर, पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके, शांत मन से इसका जप करना चाहिए। नियमित जप से एकाग्रता एवं मानसिक शांति बढ़ती है।

आध्यात्मिक एवं मानसिक प्रभाव

नियमित गायत्री साधना से मन शांत, बुद्धि तीव्र एवं आत्मविश्वास प्रबल होता है। इसका लयबद्ध उच्चारण श्वास एवं मन को संतुलित करता है, जिससे तनाव कम होता है। यही कारण है कि इसे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यक्तित्व विकास का साधन भी माना जाता है। प्रत्येक समाजबंधु को अपने दैनिक जीवन में गायत्री जप को स्थान देना चाहिए।

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