गोत्र शब्द का शाब्दिक अर्थ है — “वंश” अथवा “कुल”। प्राचीन काल में गोत्र किसी विशेष ऋषि की वंश-परंपरा को दर्शाता था। जिस ऋषि की संतान-परंपरा से कोई व्यक्ति जुड़ा होता है, वही उसका गोत्र कहलाता है। इस प्रकार गोत्र हमें अपने आदि पूर्वज ऋषि से जोड़ता है और यह बताता है कि हम किस ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं।
विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः।
अत्रिर्वसिष्ठः कश्यप इत्येते सप्त ऋषयः॥
माना जाता है कि समस्त गोत्रों की उत्पत्ति इन्हीं सप्तर्षियों एवं अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषियों से हुई है। प्रत्येक गोत्र के साथ उसके प्रवर (उस वंश के प्रमुख ऋषि-पूर्वजों के नाम) भी जुड़े होते हैं, जिनका उच्चारण संकल्प एवं संस्कारों के समय किया जाता है।
गोत्र केवल एक नाम नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक एवं आनुवंशिक पहचान है। यह हमें अपने मूल से जोड़े रखता है और यह स्मरण कराता है कि हम एक विशाल ऋषि-परंपरा के अंश हैं। धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह, यज्ञोपवीत एवं अन्य संस्कारों में गोत्र का उल्लेख अनिवार्य माना गया है।
हिंदू परंपरा में समान गोत्र में विवाह वर्जित माना गया है। इसका मूल कारण यह है कि एक ही गोत्र के व्यक्ति एक ही ऋषि-वंश की संतान माने जाते हैं, अर्थात् वे भाई-बहन तुल्य हैं। इसलिए वर एवं वधू का गोत्र भिन्न होना आवश्यक है। सामान्यतः विवाह में वर-वधू के माता-पिता दोनों के गोत्र टालने की परंपरा है।
आधुनिक आनुवंशिकी (Genetics) भी इस परंपरा की पुष्टि करती है। एक ही वंश (समान जीन-समूह) में विवाह से संतानों में आनुवंशिक रोगों की संभावना बढ़ जाती है, जबकि भिन्न वंशों में विवाह से संतति स्वस्थ एवं सशक्त होती है। इस प्रकार हमारे ऋषियों ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही स्वस्थ समाज की वैज्ञानिक व्यवस्था गोत्र परंपरा के रूप में स्थापित कर दी थी।
आदि गौड़ ब्राह्मण समाज में अनेक गोत्र प्रचलित हैं, जिनका विस्तृत विवरण एवं उनके प्रवर हमारी पञ्चाङ्ग गोत्रावली में संकलित हैं। विवाह-संबंध जोड़ने से पूर्व दोनों पक्षों के गोत्रों का मिलान करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि परंपरा एवं शास्त्र दोनों का पालन हो सके।