ज्योतिष छह वेदांगों में से एक है और इसे “वेदों का नेत्र” कहा गया है, क्योंकि यह काल एवं मुहूर्त का निर्धारण करता है, जिसके बिना वैदिक कर्मकांड संभव नहीं। मूल रूप से ज्योतिष खगोलीय पिंडों (सूर्य, चंद्र, ग्रह एवं नक्षत्र) की गति का सूक्ष्म अध्ययन है। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने बिना आधुनिक यंत्रों के ग्रहण, ऋतु-परिवर्तन एवं ग्रहों की स्थिति की जो गणनाएँ कीं, वे आज भी आश्चर्यजनक रूप से सटीक मानी जाती हैं।
पंचांग हिंदू कालगणना का आधार है, जो पाँच अंगों से मिलकर बनता है:
इन्हीं पाँच अंगों के आधार पर पर्व, व्रत, त्योहार एवं शुभ मुहूर्त निर्धारित किए जाते हैं। हमारी पञ्चाङ्ग गोत्रावली भी इसी परंपरा का अंग है।
विवाह, गृह-प्रवेश, यज्ञोपवीत, व्यापार-आरंभ आदि शुभ कार्यों हेतु उपयुक्त समय (मुहूर्त) का चयन ज्योतिष द्वारा किया जाता है। इसके पीछे भाव यह है कि प्रकृति एवं काल के अनुकूल आरंभ किया गया कार्य सुगमता से संपन्न होता है।
ज्योतिष हमारी समृद्ध ज्ञान-परंपरा का अभिन्न अंग है और इसमें खगोल-विज्ञान का गहन आधार है। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हमारे शास्त्र कर्म को सर्वोपरि मानते हैं — “कर्मण्येवाधिकारस्ते”। ज्योतिष मार्गदर्शन दे सकता है, परन्तु परिश्रम, सद्कर्म एवं सकारात्मक सोच ही जीवन की वास्तविक दिशा तय करते हैं। इसे अंधविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान एवं विवेक के साथ अपनाना चाहिए।