नारी शक्ति — समाज की रीढ़

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते

हमारी संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति, ज्ञान एवं समृद्धि का स्वरूप माना गया है। दुर्गा, सरस्वती एवं लक्ष्मी के रूप में हम नारी की ही पूजा करते हैं। मनुस्मृति का प्रसिद्ध श्लोक इस भाव को स्पष्ट करता है:

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

अर्थात् — जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं; और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं।

वैदिक काल में नारी का गौरव

वैदिक युग में नारी को शिक्षा एवं यज्ञ में समान अधिकार प्राप्त था। गार्गी एवं मैत्रेयी जैसी विदुषी नारियाँ दार्शनिक शास्त्रार्थ में भाग लेती थीं। लोपामुद्रा एवं घोषा जैसी विदुषियों ने वेद-मंत्रों की रचना की। यह दर्शाता है कि हमारी मूल परंपरा में नारी का स्थान अत्यंत गौरवशाली था।

परिवार एवं समाज की धुरी

नारी परिवार की धुरी है — वह माता के रूप में संस्कार देती है, पत्नी के रूप में सहचरी बनती है और बेटी के रूप में दो कुलों को जोड़ती है। एक शिक्षित एवं संस्कारवान नारी पूरे परिवार को शिक्षित एवं संस्कारित करती है। इसीलिए कहा गया है — “एक पुरुष की शिक्षा से एक व्यक्ति शिक्षित होता है, परन्तु एक नारी की शिक्षा से पूरा परिवार शिक्षित होता है।”

आज की आवश्यकता — सशक्तिकरण

समय के साथ आवश्यक है कि हम नारी को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर दें:

  • बेटियों की शिक्षा को बेटों के समान प्राथमिकता दें।
  • महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबन हेतु कौशल-प्रशिक्षण के अवसर दें।
  • घर एवं समाज के निर्णयों में उनकी राय एवं सहभागिता को महत्व दें।
  • कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीति के विरुद्ध सजग रहें।
  • महिलाओं के प्रति सम्मान एवं सुरक्षा का वातावरण बनाएँ।

समाज की पहल

हमारा समाज महिला मंडल सम्मेलन, स्वरोजगार हेतु सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता एवं प्रतिभा सम्मान जैसे आयोजनों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की दिशा में सक्रिय है। जब समाज की आधी शक्ति — नारी — सशक्त होगी, तभी पूरा समाज सशक्त एवं समृद्ध बन सकेगा।

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