भारतवर्ष के ब्राह्मण समाज को शास्त्रों में मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया गया है — पंच गौड़ एवं पंच द्रविड़। इस विभाजन का आधार भौगोलिक है — विन्ध्य पर्वत की उत्तर दिशा में निवास करने वाले पाँच ब्राह्मण-समूह “पंच गौड़” तथा दक्षिण के पाँच समूह “पंच द्रविड़” कहलाते हैं।
सारस्वताः कान्यकुब्जाः, गौडाः उत्कल मैथिलाः।
पञ्च गौडा इति ख्याताः, विन्ध्यस्योत्तरवासिनः॥
पंच गौड़ में निम्नलिखित पाँच ब्राह्मण समूह सम्मिलित हैं:
विन्ध्य के दक्षिण में — कर्णाटक, तैलंग (आन्ध्र), द्राविड़ (तमिल), महाराष्ट्र एवं गुर्जर ब्राह्मण पंच द्रविड़ कहलाते हैं।
पंच गौड़ में जिन ब्राह्मणों पर कोई विशेष क्षेत्रीय नाम नहीं जुड़ा और जिन पर केवल “गौड़” नाम ही यथावत रहा, वे “आदि गौड़ ब्राह्मण” कहलाए। इसीलिए शास्त्र-सम्मत रूप से “गौड़” एवं “आदि गौड़” में कोई भेद नहीं है — उत्तर भारत के सभी गौड़ ब्राह्मण मूलतः एक ही परंपरा के वाहक हैं।
स्कन्द पुराण, ब्रह्मपुराण एवं महाभारत के प्रमाणों के अनुसार आदि गौड़ ब्राह्मणों की उत्पत्ति कुरुक्षेत्र (ब्रह्मक्षेत्र) में हुई। गंगा एवं गण्डकी के संगम से उत्तर में हिमालय तक फैली भूमि — अर्थात् ब्रह्मावर्त प्रदेश — का नाम “गौड़ देश” रहा, और इसी से गौड़ ब्राह्मणों की पहचान बनी।
महाराज जनमेजय के यज्ञ में महर्षि वकदेव मुनि ने अपने १४४४ शिष्य ब्राह्मणों को ग्राम दान किए। जो ब्राह्मण जिस ग्राम में बसा, उसी ग्राम के नाम से उसका “शासन (अल्प/अवटंक)” कहलाया। इसीलिए गौड़ एवं आदि गौड़ ब्राह्मण मूलतः एक ही हैं तथा इनमें परस्पर वैवाहिक संबंध की परंपरा रही है।
हमारी इस गौरवशाली परंपरा को विस्तार से जानने के लिए समाज का इतिहास अवश्य पढ़ें।