भारतीय समाज की आत्मा उसका परिवार है, और संयुक्त परिवार तो सदियों से हमारी संस्कृति की पहचान रहा है। जहाँ दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची एवं बच्चे एक ही छत के नीचे प्रेम एवं सहयोग से रहते हैं, वहाँ जीवन के सुख-दुःख बँट जाते हैं और शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” (सारी वसुधा एक परिवार है) — इस महान भावना का प्रथम पाठ हम अपने परिवार से ही सीखते हैं।
घर के बुजुर्ग परिवार के वटवृक्ष हैं, जिनकी छाया में पूरी पीढ़ी संस्कारित होती है। उनका अनुभव एवं आशीर्वाद अनमोल है। उनका सम्मान करना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि सबसे बड़ा संस्कार है — क्योंकि जो हम आज उनके साथ करेंगे, वही हमारे बच्चे कल हमसे सीखेंगे।
रोजगार हेतु पलायन, छोटे आवास एवं व्यक्तिवादी सोच के कारण आज एकल परिवार (nuclear family) बढ़ रहे हैं। इससे बच्चों को संस्कार एवं बुजुर्गों को सहारा — दोनों की कमी खलती है। परन्तु दूरी होने पर भी हम पारिवारिक जुड़ाव बनाए रख सकते हैं।
संयुक्त परिवार हमारी सबसे बड़ी सामाजिक पूँजी है। इसे संजोकर रखना ही एक सशक्त, संस्कारवान एवं सुखी समाज की नींव है।