हमारी संस्कृति में विद्या को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ब्राह्मण समाज तो सदैव से ज्ञान का वाहक एवं संरक्षक रहा है। कहा गया है कि धन चोरी हो सकता है, बँट सकता है, समाप्त हो सकता है — परन्तु विद्या ऐसा धन है जो बाँटने से घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है और जीवनपर्यंत साथ रहती है।
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
अर्थात् — विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता से पात्रता आती है, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। इस प्रकार समस्त उन्नति की जड़ शिक्षा ही है।
गुरुकुल परंपरा में विद्यार्थी वेद, शास्त्र, गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद एवं नीति की शिक्षा ग्रहण करते थे। यह शिक्षा केवल जानकारी नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण एवं जीवन-मूल्यों पर केंद्रित थी। आज भी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य यही है — ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार एवं विवेक का विकास।
आज के प्रतिस्पर्धी युग में हमारे बच्चों को विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अग्रणी होना आवश्यक है। परंपरा एवं आधुनिकता का संतुलन ही सच्ची शिक्षा है। समाज के प्रत्येक परिवार का कर्तव्य है कि वह बालक-बालिका दोनों की शिक्षा को समान प्राथमिकता दे। बेटियों की शिक्षा पूरे परिवार एवं समाज को शिक्षित करती है।
कोई भी प्रतिभाशाली विद्यार्थी केवल आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए — यह सुनिश्चित करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हमारा समाज इस दिशा में सक्रिय है:
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि समाज के प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा का प्रकाश पहुँचे। शिक्षित समाज ही सशक्त एवं समृद्ध समाज है।