प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व में अद्वितीय थी। गुरुकुल — अर्थात् गुरु का कुल अथवा परिवार — वह पवित्र स्थान था जहाँ विद्यार्थी अपने घर-परिवार से दूर रहकर, गुरु के सान्निध्य में विद्या एवं जीवन-मूल्यों का अध्ययन करते थे। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला एवं वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय सम्पूर्ण विश्व के लिए ज्ञान के केंद्र थे, जहाँ दूर-दूर के देशों से विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
इस श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के समान बताया गया है — क्योंकि गुरु ही अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश देते हैं।
आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने विज्ञान, तकनीक एवं वैश्विक ज्ञान तक पहुँच को सर्वसुलभ बनाया है। आज शिक्षा सभी वर्गों एवं दोनों लिंगों के लिए खुली है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। परन्तु इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी हैं — शिक्षा प्रायः केवल अंक एवं नौकरी तक सीमित हो गई है, जबकि चरित्र-निर्माण एवं जीवन-मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं।
आज आवश्यकता है कि हम आधुनिक शिक्षा की वैज्ञानिक दृष्टि को गुरुकुल परंपरा के संस्कार एवं मूल्यों के साथ जोड़ें। इसके लिए:
जब आधुनिक ज्ञान एवं प्राचीन संस्कारों का यह संगम होगा, तभी हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर पाएँगे जो न केवल सफल, बल्कि सुसंस्कृत एवं संवेदनशील भी होगी।