संस्कार का अर्थ है — परिष्कार, अर्थात् किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को शुद्ध एवं उत्तम बनाना। हिंदू परंपरा में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण पड़ाव पर एक संस्कार निर्धारित किया गया है। इनका उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास को दिशा देना तथा उसे एक सुसंस्कृत नागरिक बनाना है। महर्षि वेदव्यास एवं गौतम आदि स्मृतिकारों ने इन्हें सोलह संस्कारों के रूप में व्यवस्थित किया।
सोलह संस्कारों में उपनयन संस्कार का विशेष महत्व है। इसे “द्वितीय जन्म” कहा जाता है, इसीलिए ब्राह्मण को “द्विज” कहा जाता है। इसी संस्कार में बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और वह वेदाध्ययन का अधिकारी बनता है। यज्ञोपवीत (जनेऊ) के तीन सूत्र देव-ऋण, ऋषि-ऋण एवं पितृ-ऋण के प्रतीक माने जाते हैं।
यद्यपि आज सभी सोलह संस्कार विधिवत रूप से नहीं किए जाते, फिर भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारम्भ, उपनयन एवं विवाह जैसे संस्कार आज भी सजीव हैं। ये संस्कार परिवार को जोड़ते हैं, बच्चों में मूल्यों का बीजारोपण करते हैं और हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखते हैं। संस्कारवान पीढ़ी ही समृद्ध समाज की नींव है।